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उक्रांद का संकल्प

आज 20 साल बाद भी पहाड़ वहीँ खड़ा है, उन्ही समस्याओं से जूझ रहा है जिसके समाधान के लिए उत्तराखंड क्रांति दल ने पृथक राज्य की मांग की थी।

कभी देवभूमि के नाम से पहचाने जाने वाला उत्तराखंड ऐसे लोगों के हाथों में है जिनकी राजनीतिक नासमझी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के चलते आज उत्तराखंड बेरोजगारी, राजनीतिक-नौकरशाही-माफिया के गठजोड़, राजनीतिक अस्थिरता, संसाधनों की खुली लूट, अपराध आदि की खतरनाक राह पर चल पड़ा है।

उक्रांद ने सन् 1979 में ऐसी ही स्तिथियों एवं परिस्थितियों में पृथक उत्तराखंड राज्य को अपना विकल्प माना था।
इसके लिए संघर्ष भी किया था और सफलता के साथ उत्तराखंड राज्य की स्थापना में बहुत बड़ा योगदान और अभूतपूर्व बलिदान किया था।

अब हम उत्तराखंड के नवनिर्माण के लिए नए संकल्पों के साथ आ रहे हैं।

जब उक्रांद ने उत्तराखंड राज्य की कल्पना की थी, तब भी हमारे पास राज्य को आगे ले जाने वाली पूरी दृष्टि एवं योजनाएं थी। उसे हम कई बार अलग-अलग अवसरों पर जनता के बीच लाते रहे हैं। उत्तराखंड क्रान्ति दल ने राज्य आंदोलन के समय राज्य का जो प्रारूप रखा था, यदि सरकारों ने उसे मान लिया होता तो आज राज्य की स्थिति बहुत बेहतर होती।

हमें अब इन उत्तराखंड एवं जन विरोधी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से जल्दी मुक्ति चाहिए और इसके लिए राजनीतिक प्रतिकार की आवश्यकता है। उत्तराखंड क्रान्ति दल इसका सशक्त विकल्प बनेगा और खुशहाल राज्य के सपने को साकार करेगा।

हमारे जो मुख्य मुद्दे जिनपर हमने पृथक राज्य चाहा था और जिनके लिए हम संघर्ष कर लागू करवाना चाहते हैं वो इस प्रकार हैं
मूल निवास लागू करना , हिमाचल की तर्ज पर भू क़ानून , नौकरियों में मूल निवासी के लिए आरक्षण, हर घर एक सरकारी नौकरी, सफल स्वरोज़गार नीति, वन अधिनियम में उत्तराखंड हित में बदलाव के साथ ग्रीन बोनस की मांग, परिसम्पत्तियों पर उत्तराखंड का अधिकार , राज्य के संसाधनों जैसे पानी और बिजली जनकल्याण के लिए जरूरतमंद तबके को मुफ्त प्रदान करना , लोकायुक्त का गठन , गैरसैण को राजधानी घोषित करना , संविदा कृमियों को स्थाई करना आदि

हमारे आदर्श

डी. डी. पन्त

प्रो. पन्त, संस्थापक उत्त्तराखण्ड क्रांति दल, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, का जन्म देवी दत्त पन्त 1919 में आज के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ गांव देवराड़ी में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। पिता अम्बा दत्त वैद्यकी से गुजर-बसर करते थे। बालक देवी की कुशाग्र बुfद्ध गांव में चर्चा का विषय बनी

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जसवंत सिंह बिष्ट

श्री जसवंत सिंह बिष्ट जी का जन्म अविभाजित उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा जिले की रानीखेत तहसील की बिचला चौकोट पट्टी में स्याल्दे के निकट तिमली गांव में जनवरी 1929 में हुआ था। उनका बचपन बेहद गरीबी में बीता। उनकी सादगी और ईमानदारी के चर्चे आज भी लोग याद करते हैं। जसवंत सिंह बिष्ट 1944 में ग्वालियर

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इंद्रमणि बडोनी जी

श्री इन्द्रमणि बडोनी का जन्म 24 दिसम्बर 1924 को टिहरी गढवाल के जखोली ब्लाक के अखोडी ग्राम में हुआ। उनके पिता का नाम श्री सुरेशानंद बडोनी था। जीवन के प्रारंभिक काल से बडोनी विद्रोही प्रकृति के थे। उन दिनों टिहरी रियासत में प्रवेश करने के लिए चवन्नी टैक्स देना होता था। एक बार जब बालक बडोनी अपने साथियों

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विपिन चंद्र त्रिपाठी

23 फरवरी, १९४५ को अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट के दौला गांव में जन्मे विपिन त्रिपाठी जी आम जनता में "विपिन दा" के नाम से प्रसिद्ध थे। पृथक राज्य आन्दोलन के वे अकेले ऎसे विकास प्रमुख रहे हैं, जिनके द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को उत्तराखण्ड विरोधी नीतियों के खिलाफ दिये गये त्याग पत्र को शासन ने स्वीकार

केंद्रीय समिति

श्री दिवाकर भट्ट

केंद्रीय अध्यक्ष, उक्रांद

श्री काशी सिंह ऐरी

संरक्षक

श्री बी डी रतूड़ी

संरक्षक

श्री त्रिवेंद्र सिंह पंवार

संरक्षक

श्री नारायण जंतवाल

संरक्षक

श्री पुष्पेश त्रिपाठी

संरक्षक

श्री हरीश पाठक

केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष

श्री आनंद प्रकाश जुयाल

पूर्व केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष

जरा याद करो कुरबानी

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मीडिया

चैंपियन की बीजेपी में घरवापसी का UKD ने किया जबरदस्त विरोध

भाजपा का कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन को अपने दल में वापस लेना एक निंदनीय कदम है। राष्ट्रीय दल हमेशा पहाड़ विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे है। भाजपा आजतक जोड़ तोड़ की राजनीती करती आयी है जिससे हमारे प्रदेश को काफी नुकसान हुआ। ये कदम जनता और उत्तराखंड प्रदेश पर एक

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