भारत देश की स्वतन्त्रता

लंबे संघर्षो और बलिदानों के बाद 15 August 1947 को भारत आजादी मिली और इस आज़ादी की लड़ाई में उत्तराखंड के लोगों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया था और अनवरत संघर्ष किया था। स्वतंत्रता मिलने के पश्चात देश के कई राज्यों का पुनर्गठन हुआ साथ ही कुछ नये राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों का गठन हुआ। उत्तरप्रदेश राज्य के पर्वतीय भूभाग (अब उत्तराखंड राज्य ) की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को मद्देनज़र रखते हूए 1950 से ही यहां के जनप्रतिनिधियों ने समय समय पर उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने जाने की मांग उठाई, पर उनकी मांग को केंद्रीय नेतृत्व ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। वर्ष 1971 में टिहरी के तत्कालीन सांसद स्वर्गीय प्रतापसिंह नेगी जी ने अलग राज्य की पुरजोर पैरवी की थी तथा उनकी प्रेरणा से छात्र संगठनों ने धरने प्रर्दशन भी किये थे पर वह आंदोलन भी जनांदोलन का रूप नहीं ले सका। लेकिन अलग राज्य की अवधारणा कहीं न कहीं हमारे जनप्रतिनिधियों के दिल में बनी रही।

स्व० इंद्रमणि बडोनी

फिर स्व० इंद्रमणि बडोनी जी 1967 से देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से उत्तर प्रदेश की विधानसभा में गये। लखनऊ द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा तथा उनके द्वारा विधानसभा में पहाड़ के मुद्दों पर मैदानी क्षेत्रों के विधायकों द्वारा उपहास किये जाने के कारण उनके मन में अलग राज्य की अवधारणा प्रबल हो गई। इसी के चलते वे 1977 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और कांग्रेस तथा जनता पार्टी के प्रत्याशियों को धूल चटाकर विजयी हुए। विजयी होने के उपरान्त पर्वतीय क्षेत्र के विकास एवम् पृथक राज्य के लिये लखनऊ विधानसभा में उनका संघर्ष जारी रहा।

उत्तराखंड क्रान्ति दल का गठन

डा० डी०डी० पंत

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की घोर उपेक्षा के चलते गढ़वाल-कुमाऊं के तत्कालीन जन नेताओं ने दि0 24 व 25 जुलाई 1979 को “अनुपम होटल ” मसूरी में दो दिवसीय बैठक की और श्रद्धेय श्रीदेव सुमन जी के बलिदान दिवस को उपयुक्त मानकर 25 जुलाई 1979 को अलग क्षेत्रीय दल का गठन कर दिया। सम्यक विचार-विमर्श के उपरांत दल का नाम ” उत्तराखंड क्रान्ति दल “ रखा गया तथा कुमाऊँ विश्वविद्यालय के उप कुलपति स्व० डा० डी०डी० पंत को सर्वसम्मति से पार्टी का केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया। इसमें श्री नित्यानन्द भट्ट, डी.डी. पंत, जगदीश कापडी, के. एन. उनियाल, ललित किशोर पांडे, बीर सिंह ठाकुर, हुकम सिंह पंवार, इन्द्रमणि बडोनी और देवेन्द्र सनवाल ने भाग लिया. सम्मेलन में यह राय बनी कि जब तक उत्तराखण्ड के लोग राजनीतिक संगठन के रूप एकजुट नहीं हो जाते, तब तक उत्तराखण्ड राज्य नहीं बन सकता।

इस प्रथम सम्मेलन में यह संकल्प लिया गया कि पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा, शिक्षा, सड़क, स्वाथ्य व रोजगार के साधन न होने के कारण विवशता में हो रहे युवाओं के पलायन के प्रति जनता को जागरूक किया जायेगा तथा सदस्यता अभियान चलाकर पार्टी का जनाधार बढ़ाया जायेगा और उत्तराखंड क्रान्ति दल ने इस पर अमल करना प्रारंभ कर दिया।। यहीं पर यह तथ्य सामने आया कि “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आया”

उक्रांद का बढ़ता जनाधार

अगले ही दिन देहरादून में पार्टी की पत्रकार वार्ता आयोजित की गई तथा इस अवसर पर श्री बी० डी० रतूड़ी व श्री अब्बल सिंह बिष्ट ने अपने अन्य साथियों के साथ पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और केन्द्रीय अध्यक्ष डा० डी० डी० पंत ने श्री बी० डी० रतूड़ी को देहरादून महानगर का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। देहरादून जैसे शहर में जहाँ देश के विभिन्न राज्यों के लोग रहते थे, उक्राँद की विचारधारा से जोड़ना तब बहुत दुष्कर कार्य था परंतु अपने मधुर स्वभाव व पार्टी के प्रति समर्पण की भावना से उन्होंने पार्टी के जनाधार को बढा़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में विॆभिन्न पदों पर रहते हुए पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष के पद तक पहुँचे ।

मा० इंद्रमणि बडोनी जी, जो पहले से ही अलग राज्य की परिकल्पना कर चुके थे, ने भी 25 जुलाई 1980 को हलद्वानी में संपन्न वार्षिक महाधिवेशन में उत्तराखंड क्रान्ति दल की सदस्यता ग्रहण की उनके साथ ही श्री विपिन त्रिपाठी, श्री त्रिवेंद्र सिंह पंवार, स्व० श्री आनंद सिंह गुसाईं सहित सैकड़ों लोगों ने उत्तराखंड क्रान्ति दल की सदस्यता ग्रहण की। स्व० बडोनी जी व डा० डी० डी० पंत जी के संरक्षण व मार्गदर्शन तथा श्री दिवाकर भट्ट, श्री विपिन त्रिपाठी, श्री त्रिवेंद्र पंवार, श्री मदनमोहन नौटियाल, श्री बी० डी० रतूडी, स्व० श्री आनंद सिंह गुसाईं, श्री नित्यानंद भट्ट जैसे अनेक युवाओं के जोश, समर्पण एवं अथक प्रयासों के चलते पार्टी का जनाधार बढ़ता चला गया।

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स्व० श्री जसवंत सिंह बिष्ट

इसका परिणाम तब सामने आया जब रानीखेत विधानसभा से बहुत ही सरल, ईमानदार व संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी स्व० श्री जसवंत सिंह बिष्ट को रानीखेत विधानसभा सीट से उत्तराखंड क्रांति दल का पहला विधायक बनने का गौरव हासिल हुआ। कहते हैं जिस दिन श्री जसवंत सिंह बिष्ट जी घर से नामांकन के लिए अल्मोड़ा को चले उनकी जेब में मात्र छः रुपये थे और उनमें से भी चार रुपये रास्ते में किसी जरूरतमंद को दे दिए तथा शेष दो रुपये रास्ते में मंदिर में भेंट चढ़ा दिए। परंतु जैसे जैसे लोगों को पता चलता गया अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी मदद करते चले गये और अल्मोड़ा जाते-जाते उनके पास नामांकन के लिए आवश्यक धनराशि एकत्रित हो गयी थी।

श्री काशी सिंह ऐरी

तेजतर्रार युवा तुर्क के नाम से जाने जाने वाले श्री काशी सिंह ऐरी जो शुरू से ही दल से जुड़े रहे छात्र आंदोलन में जेल में होने के कारण 1979 की पहली मसूरी की बैठक में नहीं जा पाए थे। 1980 में इन्होने लोकसभा अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से डा० डी०डी० पंत जी को चुनाव लड़वाया। तत्पश्चात वर्ष 1985 के विधानसभा चुनावों में श्री काशी सिंह ऐरी डीडीहाट (पिथौरागढ़) विधानसभा सीट से विजयी होकर आये। उल्लेखनीय है कि अपने पहले ही कार्यकाल में श्री काशी सिंह ऐरी ने उत्तरप्रदेश विधानसभा के एक सत्र में एक ही दिन 70 विधानसभा प्रश्न लगा दिये थे जिस कारण यह नियम बनाना पड़ा कि एक विधायक पांच ही प्रश्न लगा सकते हैं। बाद में डा० नारायण सिंह जंतवाल ने भी सैकड़ों समर्थकों के साथ उत्तराखंड क्रान्ति दल की सदस्यता ग्रहण की। उनकेे दल में शामिल होने पर दल और मजबूत हुआ। पार्टी की विश्वसनीयता और जनाधार ने और अधिक विस्तार पाया। इसी वर्ष श्रीनगर गढ़वाल में पार्टी की छात्र इकाई का गठन किया गया जिसका नाम उत्तराखंड स्टूडेंट फैडरेशन (USF) रखा गया तथा युवा छात्र नेता श्री नारायण सिंह जंतवाल पहले यू. एस. एफ. के अध्यक्ष चुने गये।

स्व० इन्द्रमणि बडोनी जी, डा० डी० डी०पंत, श्री जसवंत सिंह बिष्ट, श्री काशी सिंह ऐरी, श्री विपिन त्रिपाठी, श्री दिवाकर भट्ट, श्री त्रिवेंद्र पंवार, श्री कृपाल सिंह सरोज, श्री मदनमोहन नौटियाल, श्री नित्यानंद भट्ट, श्री बी० डी० रतूड़ी आदि वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में पर्वतीय क्षेत्रों में निरंतर भ्रमण किया जिनमें नारायण आश्रम (पिथौरागढ़) से रामा सिराईं (उत्तरकाशी) तथा तवाघाट से देहरादून की पैदल यात्रायें प्रमुख थी। इस विषय में यह विशेष उल्लेखनीय है कि पार्टी के पास अपना कोई कोष न होने के बावजूद सारी यात्राएं स्वस्फूर्त रूप से ईष्ट मित्रों के सहयोग व अतिथि देवो भव: की भावना से निर्विकार रूप से संपन्न हो जाया करती थी। इधर अलग उत्तराखंड राज्य की आवश्यकता तथा राज्य बनने के उपरांत राज्य की आय के स्रोत रोजगार व स्वरोजगार, राज्य की राजधानी आदि विषयों पर भी गहन चिंतन मनन ज़ारी था।

उत्तराखंड के लिए उत्तराखंड क्रांति दल ( उक्रांद ) का लगातार संघर्ष

इसी बीच केन्द्र द्वारा वन अधिनियम को सख्त करते हुए हमारे जल जंगल व जमीन के अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया। केन्द्र ने सभी राज्यों को अपने अपने क्षेत्रफल का 20 प्रतिशत भाग आरक्षित वनक्षेत्र घोषित करने के आदेश कर दिये और तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्वतीय क्षेत्र के सभी वनपंचायतों को भी आरक्षित वनक्षेत्र घोषित कर अपना 20 प्रतिशत का कोटा पूरा कर लिया।

जिससे पर्वतीय क्षेत्र की अधिकांश परियोजनाएं व सड़क निर्माण के कार्य बाधित होने लगे। इसे दल ने काला कानून मानते हुए वन अधिनियम के विरुद्ध व अपने जल जंगल जमीन के हक हकूकों की लड़ाई प्रारंभ कर दी। जिसके तहत समस्त प्रदेश में अधूरी रुकी परियोजनाओं और मार्ग निर्माण में बाधक पेड़ों को काटने का निर्णय लिया गया । और हमारे सभी तत्कालीन नेताओं ने अपने अपने क्षेत्रों में ऐसे पेड़ स्थानीय जनता के सहयोग से काट डाले। हालांकि जितने पेड़ काटे गये उनसे दोगुने से अधिक नये पेड़ भी उक्रांद नेताओं द्वारा लगाए गये, यथापि सरकार द्वारा उक्रांद नेताओं के विरुद्ध दर्जनों मुकदमे दर्ज कर दिये गये।

आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो

पार्टी ने समय-समय पर जन-सरोकारों को लेकर वन अधिनियम तथा पर्वतीय क्षेत्रों के साथ केन्द्र व उत्तर प्रदेश सरकार के उपेक्षापूर्ण व्यवहार को लेकर बड़े-बड़े आंदोलन किए। इसी कड़ी में दि० 10 नवंबर 1986 को गढ़वाल कमिश्नरी पौड़ी तथा 9 मार्च 1987 को कुमाऊं कमिश्नरी नैनीताल में लाखों की संख्या में उत्तराखंड की जनता रैलियों में सम्मिलित हुई थी। दि० 23 अप्रैल 1987 को दिल्ली में आहुत रैली के दौरान श्री त्रिवेंद्र सिंह पंवार के नेतृत्व में संसद भवन में “आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो” के नारे के साथ पत्रबम फेंका गया। उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया गया। तदुपरांत पुनः 23 नवंबर 1987 को दिल्ली में ही एक विशाल रैली हेतु दिल्ली जाते हुए गाजियाबाद पुलिस से हुई नोक-झोंक के दौरान श्री त्रिवेंद्र सिंह पंवार हिंडन पुल से नदी में गिर गये जिस कारण उनका एक पैर टूट गया वे आज भी लंगड़ा कर चलते हैं।

पृथक राज्य बनने से पहले ही उक्रांद ने प्रस्तावित राज्य की राजधानी हेतु गढ़वाल- कुमाऊँ के मध्य एवम् राज्य मे सम्मिलित होने वाले सभी जिलों की राजधानियों से लगभग समान दूरी पर स्थित गैरसैंण को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जो राज्यविरोधी ताकतों के मुँह पर करारा तमाचा था जो जनता में हमेशा गढ़वाल – कुमाऊँ के बीच विवाद पैदा करने की नीयत से कहते थे कि अलग राज्य बनने पर राजधानी पर उक्राँद में आम सहमति नहीं बन पायेगी

अंततोगत्वा समस्त पर्वतवासियों की राय, उत्तराखंड के वैग्यानिको, भूगर्भवेत्ताओं, जल विद्युत, सड़क निर्माण, वानिकी,उद्यान, पर्यटन एवम् अन्य विषयों में अनुभव रखने वाले विशेषग्यों की राय के उपरांत स्व0 इन्द्रमणि बडोनी जी व स्व0 डा0 डी डी पंत जी के संरक्षण,मा0 काशीसिंह ऐरी की अध्यक्षता में स्व0 विपिन त्रिपाठी द्वारा तैयार ” उत्तराखंड राज्य ” का ब्ल्यू-प्रिंट वर्ष 1992 की 14-15 जनवरी को माघ मेला बागेश्वर में लाखों लोगों की उपस्थिति में ” उत्तरायणी ” के अवसर पर जनता के समक्ष रखा गया जिसे समूचे उत्तराखंड से पहुँचे जन नेताओं एवं उपस्थित जनसमुदाय ने बड़े हर्षोल्लास के साथ करतल ध्वनि एवं “जय उत्तराखंड” के जयघोष के साथ अनुमोदित किया गया ।

उक्राँद का अलग राज्य का आंदोलन चल ही रहा था जिसे जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा कि इस बीच वर्ष 1994 में केन्द्र की विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिश पर 27% ओबीसी को आरक्षण दिये जाने के विरुद्ध देशव्यापी छात्रआंदोलन प्रारंभ हो गया,उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं रह सका बल्कि आरक्षण के विरुद्ध भड़के इस आंदोलन ने ही पृथक राज्य आंदोलन को चरम पर पहुंचाया जिसका नेतृत्व उक्राँद के तत्कालीन अध्यक्ष मा0 काशीसिंह ऐरी द्वारा किया गया।

फील्ड मार्शल श्री दिवाकर भट्ट जी

जहाँ एक ओर बडोनी जी के नेतृत्व में शांतिपूर्ण, अहिंसक आदोलन चला बडी़ बड़ी रैलिय़ाँ निकली जिसमे कहीं पर हिंसक प्रदर्शन नहीं हुए, जिसके परिणाम स्वरूप बडोनी पूरे विश्व में ” पर्वतीय गांधी ” के नाम से जाने जाने लगे। वहीं कुछ तेज तर्रार युवा उग्र आंदोलन के पक्ष में थे और कतिपय अवसरों पर वे पार्टी में भी आंदोलन को उग्र बनाने पर जोर देते थे,ऐसे कार्यकर्ताओं का नेतृत्व मा0 दिवाकर भट्ट जी करते थे,उनके तेवर हमेशा उग्र रहते थे तथा वे पहाड़विरोधी मानसिकता रखने वालों को कड़ा सबक सिखाने के पक्षधर थे,परंतु वे स्व0 बडोनी जी का बहुत सम्मान करते थे और उनके समझाने पर शांत हो जाते थे। श्री दिवाकर भट्ट के उग्र तेवरों के चलते ही स्व0 बडोनी जी ने श्री दिवाकर भट्ट जी को ” फील्ड मार्शल “ का नाम दिया था जो आज भी प्रचलित है 

पृथक राज्य से पहले चुनावों मे उक्रांद की जीत / हार

पार्टी के क्रियाकलापों व संघर्ष के चलते जनता में पार्टी की स्वीकार्यता इतनी थी कि 1989 के लोक-सभा चुनावों में कांग्रेस-भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के समक्ष, जिनके पास धनबल, संगठन व चुनावी संसाधनों की भरमार थी, हमारे प्रत्याशी टिहरी से स्व० इन्द्रमणि बडोनी जी और अल्मोड़ा से श्री काशी सिंह ऐरी मात्र 8000 व 10000 के मामूली अंतर से हार गए। जिसका मुख्य कारण धनबल व संसाधन न होने के अतिरिक्त पार्टी का ब्लौक स्तर व बूथ स्तर पर संगठन नहीं होना था।

श्री काशी सिंह ऐरी

पर एक साथ हुए लोकसभा विधानसभा चुनावों में श्री काशी सिंह ऐरी डीडीहाट विधानसभा सीट तथा श्री जसवंत सिंह बिष्ट रानीखेत विधानसभा सीट से विजयी हुए। वर्ष 1989 में जीत कर आये उक्राँद के इन दोनों विधायकों द्वारा उत्तराखंड क्षेत्र से जुडे़ विकास के मुद्दों,सड़क -स्वास्थ्य एवं शिक्षा,जल-जंगल-जमीन,पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकने हेतु ठोस रणनीति बनाने व तत्कालीन पर्वतीय 8 जिलों के साथ हरिद्वार का कुंभ क्षेत्र को मिलाकर ( केदार खंड व मानस खंड ) ” उत्तराखंड” नाम से अलग राज्य की मांग समय समय पर उत्तरप्रदेश की विधानसभा के प्रत्येक सत्र में की जाती रही परंतु उत्तरप्रदेश व केन्द्र सरकार की पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा,यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन व अपार सौंदर्य से परिपूर्ण यहाँ के रमणीक पर्यटक स्थलों को अपनी ऐशगाह बनाये रखने की नीति के चलते कभी भी हमारी इस माँग को गंभीरता से नहीं लिया । 

उत्तराखंड और उक्रांद के साथ राजनीतिक छल कपट

  1. वर्ष 1996 में लोकसभा चुनाव में ” राज्य नहीं तो चुनाव नहीं ” के नारे के साथ चुनाव में प्रत्याशी न उतारना –
    • उत्तराखंड आंदोलन में केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की नियत से उक्रांद ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया था कि वर्ष 1996 के लोकसभा चुनावों का बहिष्कार किया जायेगा और ” राज्य नहीं तो चुनाव नहीं ” के नारे के साथ चुनाव टाला जाएगा।
    • लेकिन भाजपा कांग्रेस की मिलीभगत से जनभावना के विरुद्ध चुनाव करा दिए जिन चुनावों में सबसे ज्यादा जनसमर्थन होते हुए भी उक्रांद ने भाग नहीं लिया।
    • फलस्वरूप भाजपा कांग्रेस के लोग संसद पहुंच गए जिनका राज्य आंदोलन में कोई योगदान नहीं और जनता ने राष्ट्रीय दलों के इस छल प्रपंच में आ कर उक्राँद के इतने सालों के संघर्ष राज्यनिर्माण के प्रति ईमानदारी व दूरदृष्टि पर अविश्वास कर अंजाने में गलत हाथों में सत्ता सौंप दी, वरना 1996 में यदि उक्राँद राज्य में लोकसभा चुनाव में भागीदारी करता तो राष्ट्रीय दलों की जमानत तक नहीं बचती।
  2. नवोदित राज्य को केंद्रशासित प्रदेश होना चाहिए –
    • उत्तराखंड क्रांति दल का स्पष्ट मत था कि नवोदित राज्य को केंद्रशासित प्रदेश होना चाहिए ताकि केन्द्र सरकार के संरक्षण में कम से कम दस वर्षों तक राज्य को अपने पैरों पर खडा़ होने का मौका मिल जाय और तब जाकर उत्तराखंड को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले । इसीलिये स्व0 बडोनी जी व डा0 डी0 डी0 पंत जी के दिशानिर्देश पर मा0 काशी सिंह ऐरी जी, स्व0 विपिन चंद्र त्रिपाठी जी व श्री त्रिवेन्द्र सिंह पंवार जी केंन्द्र सरकार व अन्य सहयोगी राष्ट्रीय दलों के नेताओं से उत्तराखंड को केन्द्रशासित राज्य घोषित करवाने के लिए प्रयास करते रहे। उनसे मिले आश्वासनों से हमारे नेता आश्वस्त थे कि हमें अपना राज्य केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में मिलने जा रहा है इसलिए न तो चुनावों की तैयारी की और न ही संगठन पर ध्यान दिया बस आंदोलन के दौर की भीड़ को याद करके आश्वस्त थे कि सारी जनता हमारे साथ है। दुर्भाग्य से इस बीच 18 अगस्त 1999 को दल के संरक्षक मा0 इन्द्रमणि बडोनी जी का निधन हो गया। पर्वतीय गांधी के नाम से जाने वाले इस महात्मा का निधन उक्राँद के लिए ही नहीं बल्कि समूचे उत्तराखंड के लिये अपूरणीय क्षति थी।
    • परंतु जब अचानक 15 अगस्त को अटल बिहारी वाजपेई तत्कालीन प्रधानमंत्री जी ने 70 विधानसभाओं वाले पूर्ण उत्तराखंड राज्य की घोषणा की तब उक्राँद का केन्द्रशासित प्रदेश का सपना भी टूट गया। राज्य की घोषणा पर अधिकांश उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी ताकतें भी अचंभे में थी। अचंभा यह कि पहले तो राज्य का विरोध कर रहे थे और अब दिया तो हरिद्वार को भी मिला दिया। बाकी तबसे अब तक पर्वतीय कॆ क्षेत्रों का कितना विकास हुआ और राज्य की अवधारणा का क्या हश्र हुआ ये हर व्यक्ति समझता है पर अपने निजी स्वार्थों या लाचारी के कारण मौन है।
  3. राज्य के नाम से खिलवाड़ ” उत्तराँचल “?
    • भाजपा की मक्कारी देखिये जिस ” उत्तराखंड ” नाम से राज्य का आंदोलन चल रहा था जिसमे उसका नाम मात्र का योगदान नहीं उसने सत्ता में आते ही सबसे पहले राज्य का नाम बदल कर “उत्तराँचल ” कर दिया महज इसलिए क्योकि हमारे दल के नाम में ” उत्तराखंड ” है !
    • भाजपा व काँग्रेस आज भी राजधानी के स्थान व नाम को विवादित बनाये हुए हैं, पूर्व से ही तय राजधानी ” चंद्रनगर -गैरसैंण” को विवादित बनाने के लिए दीक्षित आयोग का गठन कर जनमानस का घोर अपमान किया, तथा काँग्रेस ने भी कमेवेश भाजपा की ही तरह पहाड़ मैदान की राजनीति अपनाई तथा जनता को पहाड़ मैदान में बांटे रखा ।

उक्रांद और उत्तराखंड की स्थिति

उक्रांद ने फिर से संगठन बनाने का प्रयास प्रारंभ किया पर अधिकांश वे लोग जो उक्रांद की एक पुकार पर हजारों की संख्या में सड़कों पर उतर जाते थे, भाजपा-कांग्रेस का झंडा थामे नजर आने लगे। संगठन न होना, झूठे वायदे न करना, छल-फरेब की राजनीति न करना व धनबल की कमी आदि कारणों से अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी पर 2002 में पहली विधानसभा में चार विॆधायक जीत कर विधानसभा में पहुंच सके। अपना-अपना नजरिया है विश्लेषण करने पर पूर्वाग्रह से हटकर अनुमान लगाया जा सकता है कि 71 विधायकों में ( 70+1 मनोनीत ) जहाँ 67 एक मत के हों जिन्होंने कभी राज्य का समर्थन नहीं किया वहाँ चार विधायकों की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज ही तो साबित होगी। ऊपर से जब मीडिया भी सही बात जनता के समक्ष न रख सके।

आज पहाड़ वहीँ खड़ा है जहां से पृथक राज्य की मांग आरम्भ हुई थी। उत्तराखंड राजनैतिक नासमझी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, बेरोजगारी, राजनीतिक-नौकरशाही-माफिया के गठजोड़, राजनीतिक अस्थिरता, संसाधनों की खुली लूट, अपराध आदि के चलते एक खतरनाक राह पर चल पड़ा है। कभी देवभूमि के नाम से पहचाने जाने वाला उत्तराखंड ऐसे लोगों के हाथों में है जो टीवी चैनलों में इसे लूटने के लिए सौदे करते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक अपसंस्कृति इतनी हावी हो गयी है कि कांग्रेस और भाजपा को सत्ता बचाने के लिए अपने ही विधायकों को खरीदना पड़ा। हमारे जनप्रतिनिधियों की जिस तरह बोली लगने लगी, प्रदेश के मुखिया से लेकर विधायकों तक के जिस तरह के वीडियो मीडिया में दिखाई-सुनाई दिये, उससे पूरा पहाड़ शर्मसार हुआ है। अब इससे आगे और रास्ता बचा ही नहीं है।

उक्रांद का संकल्प

आज 20 साल बाद भी पहाड़ वहीँ खड़ा है, उन्ही समस्याओं से जूझ रहा है जिसके समाधान के लिए उत्तराखंड क्रांति दल ने पृथक राज्य की मांग की थी।

कभी देवभूमि के नाम से पहचाने जाने वाला उत्तराखंड ऐसे लोगों के हाथों में है जिनकी राजनीतिक नासमझी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के चलते आज उत्तराखंड बेरोजगारी, राजनीतिक-नौकरशाही-माफिया के गठजोड़, राजनीतिक अस्थिरता, संसाधनों की खुली लूट, अपराध आदि की खतरनाक राह पर चल पड़ा है।

उक्रांद ने सन् 1979 में ऐसी ही स्तिथियों एवं परिस्थितियों में पृथक उत्तराखंड राज्य को अपना विकल्प माना था।
इसके लिए संघर्ष भी किया था और सफलता के साथ उत्तराखंड राज्य की स्थापना में बहुत बड़ा योगदान और अभूतपूर्व बलिदान किया था।

अब हम उत्तराखंड के नवनिर्माण के लिए नए संकल्पों के साथ आ रहे हैं।

जब उक्रांद ने उत्तराखंड राज्य की कल्पना की थी, तब भी हमारे पास राज्य को आगे ले जाने वाली पूरी दृष्टि एवं योजनाएं थी। उसे हम कई बार अलग-अलग अवसरों पर जनता के बीच लाते रहे हैं। उत्तराखंड क्रान्ति दल ने राज्य आंदोलन के समय राज्य का जो प्रारूप रखा था, यदि सरकारों ने उसे मान लिया होता तो आज राज्य की स्थिति बहुत बेहतर होती।

हमें अब इन उत्तराखंड एवं जन विरोधी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से जल्दी मुक्ति चाहिए और इसके लिए राजनीतिक प्रतिकार की आवश्यकता है। उत्तराखंड क्रान्ति दल इसका सशक्त विकल्प बनेगा और खुशहाल राज्य के सपने को साकार करेगा।

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